सुनलो कोई तो हमारी फरयाद बहुत बुरे हो गए हमारे हालात मजदूर हु इसलिए में कितना मजबूर हु

 



 


मजदूर हु इसलिए में कितना मजबूर हु


(वीरेंद्र ठाकुर ) 


उज्जैन / मजदूर हु इसलिए में कितना मजबूर हु जिस रोशनी के लिए चला था शहर आज उसी शहर में हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा है


आज पूरे विश्वव में कोरोना जैसा अंधेरा सारी दुनिया को धीरे धीरे निगल रहा है ये महामारी मानो पूरे मानव जाति के लिए एक काल बनकर सभी लोगो को अपने अंदर सब को एक साथ समाने आई हो 


जहाँ एक तरफ कुछ लोग इस बीमारी से जिन्दगी की जंग लड़ रहे है


वही दूसरी ओर एक मजदूर भुखमरी से जिंदगी की जंग लड़ रहा है जिस मजदूर के कंधों पर देश अपना विकास करता है आज वह मजदूर अपने जीवन इसी देश के लिए समर्पित कर रहा है जो मजदूर आपके लिए बड़ी बड़ी बिल्डिंगों को बनाता है आज उसी के लिए कोई आसरा नही है क्यो आज उसे अपने घर की इतनी याद सता रही है क्यो उसकी आवाज किसी को सुनाई नही देती है क्यो आज उसे हजारों किलो मीटर का सफर पैदल ही करना पड़ रहा है क्यो इन मजदूरों को अपने हाल पर छोड़ दिया वही


मध्यप्रदेश के मुख्या शिवराज सिंह चौहान राजिस्थान में फंसे छात्रों के लिए 150 बसे भेज सकते है ताकि सभी छात्र अपने घर जा सके पर मजदूरों की कोई सुनवाई नही इनको अपने घर क्यो नही भेजा जा सकता है इनके जीवन का महत्व सिर्फ इतना ही है कि प्रदेश का रोजगार फिर कैसे चलेगा आज मजदूर मजबूर हो कर अपने परिवार को लेकर इतनी गर्मी में पैदल ही अपने घरों के लिए निकल पड़ा


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