माननीय प्रधानमंत्री के आव्हान को, पलिता लगाते लोग,पुलिस प्रशासन ओर चिकित्सकों की मेहनत पर फेर देते हैं पल भर में पानी

 


उज्जैन/ पुरा विश्व सबकुछ भूल भूलाकर विश्व में आईं आफत कोरोना महामारी से निपटने के लिए हर एक देश ,एक दुसरे की ओर मदद की आस लगाये बैठे हैं, ना भान ही विश्व में श्रेष्ठ शक्ति प्रदर्शित करने का ना ही मलाल ही स्वयं को कमतर आकंने का ।बस हर एक देश को जूनून है अपने देश की जनता को इस महामारी से कैसे बचाया जा सकें। हर एक देश लॉक डाउन नामक बैसाखी का सहारा ले रहा है, इस बैसाखी का सहारा लेने में भारत भी पीछे नहीं है, हाँ कुछ इस सहारा लेने में चूक अवश्य हुई थी जनता कर्फ्यू ओर उसके तुरंत बाद,देश को लाक डाउन करना,लाक डाउन करने के पिछे शासन की मंशा थी कि जो जहां है वह वहीं ठहर जायें ताकि यह रोग एक दुसरे से संक्रमित न हो किन्तु हुआ विपरित, आवागमन के साधन अवरुद्ध होने से देश में हा हा कार हो गया,मजदूर लॉक डाउन तोड़कर, पैदल ही निकल गयें अपने गंतव्य की ओर सडके पट गयी गरीब मजदूरो से जिसे जैसा साधन मिला चल निकले, ओर ये आलम रहे की शासन की अ दुरदृष्टीता को लाकर करदिया खडा चौराहे पर खैर होता ही प्रथम प्रयोग में कोई खलल ।


 देश के माननीय प्रधानमंत्री के भाव रहे की जो इस महामारी में अपनी सेवा दे रहे हैं जैसे पुलिस ओर चिकित्सक विभाग उनका मनोबल बढाने के लिए, उनका स्वागत लोग अपने घरों की गैलरी या छतों पर से तालियाँ थालिया ओर शखानंद (social & human   distance)  का पालन करते हुए बजाकर करें, ताकी उनकी होसंला अफजाई होती रहें , आखिर लोग आही गयें गलियों चौराहों पर लगाने मजमा, ढोल बजाते ओर ड्रम बजाते हुए, आखिर पुलिस प्रशासन की सख्ती इन,,, भक्तों के आगे नाकाम साबित हो गयी ओर फैल कर दी पुलिस की भी तपस्या 


 सारी मीडिया उगल रही थी लॉक डाउन से स्वच्छ हुआ वातावरण ओर शुद्ध हुई पवन, बस यह वातावरण रास नहीं आया कुछ उद्दडं लोगों को,थे अवसर की तलाश में, माननीय प्रधानमंत्री 5 अप्रैल रात्रि 9 बजे 9 मिनट के बीच विद्युत उत्सर्जन से प्राप्त रोशनी को नो मिनट विराम देकर घी तेल के दीपक से घर गैलरी को रोशन करना, घर से बाहर निकलने की मना ही थी, किन्तु लोग जो उद्दडं ठहरे, एक मर्तबा फीर उद्डंता का प्रदर्शन किया ओर लेकर आ गयें तालियाँ तालियाँ बजाने के लिए गलियों में!


हम कैसे मानें की हम शिक्षित हैं,हम 21वी सदी को जी रहें हैं, हम अनुशासित है, हम पुलिस के डंडे के बगैर मान जायेंगे, हम स्वय परिवार मुहल्ले गांव शहर,देश प्रदेश को बचा सकेंगे!!!!? मुझें तो संदेह हैं इन लोगों पर की ये लोग ही हैं कोरोना के हितैषी जो शासन के निर्देशों को नहीं मान रहे हैं ।


दीपक लगाकर एकता परिचय देने की बजाय सडको पर आकर पटाखे फोडना ओर वायु को दूषित करना कहाँ की समंझदारी रही है!! बडा खैद हैं इन लोगों की मानसिकता पर की इन्हें तनिक दुख नहीं है असामयिक कोरोना के काल के गाल में समा गयें लगभग सो लोगों का ना ही हैं इन्हें चिंता तनिक देश के श्री प्रधानमंत्री मोदी के देश संरक्षण चिंतन मनन की, इन लोगों को सोचना चाहिए की पुलिस विभाग ओर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी कर्मचारी एक एक माह से अपने परिवार से मिलने के लिए तरस रहे हैं, लॉक डाउन का पालन करवाने में लोगों की स्वास्थ्य की सेवा करने मैं , कंई उद्ड लोगों के मुर्खता पूर्ण व्यवहार के शिकार भी हो रहें हैं । हमारे नादान कृत्य देखकर, उनके मन को कितनी पीडा होती होगी, क्या इसके लिए ही वे अपने परिवार से दूर बैठे हैं क्या इसके लिए वे ढायन कोरोना से दो दो हाथ कर रहे हैं अपने जीवन परिवार को संकट में डालकर!!!, हमारी सेवा कर रहे हैं!!? हमारी उद्डंता से उनके मन मस्तिष्क को कितना आघात पहुंचता होगा!


 हमें विचार करना ही चाहिए


 क्या हम पुलिस के डंडे से ही सुधरेंगें!आओ हम एक स्वच्छ भारत बनाने की पहल करते हैं, शासन के आगामी आदेश की प्रतीक्षा तक घर में ही रहते हैं ।


लेखक चुन्नीलाल परमार


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