फसल काटने के बाद बचे हुए अवशेष (नरवाई) जलाना खेती के लिये आत्मघाती कदम, नरवाई में आग लगाने पर प्रतिबंध, नरवाई जलाने वाले किसानों पर पर्यावरण विभाग कार्यवाही करेगा


(वीरेंद्र ठाकुर) 


उज्जैन । किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के उप संचालक ने जिले के कृषकों से अपील की है कि गेहूं एवं अन्य फसलों को काटने के बाद बचे हुए फसल अवशेष (नरवाई) जलाना खेती के लिये आत्मघाती कदम है। नरवाई में आग लगाने को प्रतिबंधित किया गया है। गेहूं की फसल आदि की कटाई के बाद किसान नरवाई में आग न लगायें, क्योंकि पर्यावरण में प्रदूषण के साथ-साथ मिट्टी की संरचना भी प्रभावित होती है।


निर्देशों के उल्लंघन करने पर कृषकों को पर्यावरण क्षतिपूर्ति राशि देना होगी


राष्ट्रीय हरित अधिकरण के प्रकरण तथा किसान कल्याण एवं कृषि विकास भोपाल द्वारा दिये गये निर्देश व उनके पालन की प्रक्रिया सुनिश्चित की जाना है। निर्देशों के उल्लंघन किये जाने पर व्यक्ति/निकाय को नोटिफिकेशन प्रावधान तथा दिशा-निर्देश जारी किये गये हैं। दो एकड़ से कम भूमि रखने वाले को ढाई हजार रुपये प्रति घटना पर्यावरण क्षतिपूर्ति राशि देय होगी, दो एकड़ से अधिक किन्तु पांच एकड़ से कम भूमि रखने वाले किसान को पांच हजार रुपये प्रति घटना पर्यावरण क्षतिपूर्ति राशि देय होगी। इसी प्रकार पांच एकड़ से अधिक भूमि रखने वाले को 15 हजार रुपये प्रति घटना पर्यावरण क्षतिपूर्ति राशि देय होगी।


कलेक्टर शशांक मिश्र ने कंबाईन हार्वेस्टर के कटाई के उपरान्त बची नरवाईयों में आग लगाने की घटना को देखते हुए रबी की कटाई में कंबाईन हार्वेस्टर के साथ स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम लगाने की अनिवार्यता सुनिश्चित करने के निर्देश जिले के अनुविभागीय अधिकारियों को दिये हैं। यदि कृषक ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम का उपयोग नहीं करना चाहते हैं तो उन्हें स्ट्रॉ रीपर का उपयोग करके फसल अवशेषों से भूसा प्राप्त करना अनिवार्य है। कलेक्टर शशांक मिश्र ने निर्देशित किया है कि यदि इसके उपरान्त भी कृषकों द्वारा नरवाई में आग लगाई जाती है तो उनके विरूद्ध पर्यावरण विभाग द्वारा कार्यवाही की जायेगी।


फसलों की कटाई के बाद कृषि अपशिष्टों के जलाने से हानि



खेत में गेहूं एवं अन्य फसलों के कृषि अपशिष्टों को जलाने से भूमि में उपलब्ध जैव विविधता समाप्त हो जाती है और भूमि में उपस्थित सूक्ष्म जीव जलकर नष्ट हो जाते हैं। इन जीवों के नष्ट होने के फलस्वरूप जैविक खाद का निर्माण बन्द हो जाता है। भूमि की ऊपरी परत में ही पौधों के लिये आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध रहते हैं और नरवाई जलाने से पोषक तत्व जल कर नष्ट हो जाते हैं। नरवई जलाने से भूमि कठोर हो जाती है, इसके कारण भूमि की जलधारण क्षमता कम होती है और फसलें सूखती हैं। साथ ही खेत की सीमा पर लगे पेड़-पौधे जल कर नष्ट होते हैं, पर्यावरण प्रदूषित होकर वातावरण के तापमान में वृद्धि होती है, जिससे धरती गर्म हो जाती है। कार्बन से नाइट्रोजन तथा फास्फोरस का अनुपात कम हो जाता है। इसके अलावा केंचुए नष्ट हो जाते हैं, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है।


नुकसान से बचने के लिये किसान नरवाई में आग न लगायें


नरवाई का उपयोग निम्न तरीकों से किसान कर सकते हैं। नरवाई जलाने की अपेक्षा अवशेषों और डंठलों को एकत्रित कर जैविक खाद जैसे भूनाडेप, वर्मी कम्पोस्ट आदि बनाने में उपयोग किया जाये तो बहुत जल्दी सड़कर पोषक तत्वों से भरपूर कृषक स्वयं का जैविक खाद बना सकते हैं। खेत में कल्टीवेटर, रोटावेटर या डिस्क हैरो आदि की सहायता से किसान अपनी फसल के अवशेषों को भूमि में मिलाने से आने वाली फसलों में जीवांश खाद की बचत की जा सकती है। किसान कंबाईन हार्वेस्टर के साथ स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम को सामान्य हार्वेस्टर से गेहूं कटवाने के स्थान पर स्ट्रारीपर एवं हार्वेस्टर का उपयोग करें। नरवाई में आग लगाने पर पुलिस द्वारा प्रकरण भी कायम कर सकते हैं। इसलिये किसान खेतों में नरवाई न जलायें। जिला कलेक्टर ने इस सम्बन्ध में नरवाई जलाना प्रतिबंधित किया है।


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